September 25, 2022
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1 thought on “शफीकुर्रहमान बर्क : लोकतंत्र के लिए नासूर

  1. धर्मनिरपेक्षता का मतलब सरकार को किसी धर्म या धार्मिक मामलो से मतलब नहीं।धर्म व्यक्ति एवं पन्थो एवं उसके मतावलम्बियो का आन्तरिक मामला है।जिसका प्रचार प्रसार पालन करने ना करने के लिए उस धर्म के मतावलम्बी स्वतंत्र हैं।पर्शनल लाॅ बोर्ड , हज भवन, हजसब्सिडी, मजारों पर चादर चढाना और इफ्तारी कराना सरकार का काम नहीं है।अल्पसंख्यक आयोग, बक्फ बोर्ड, कब्रगाहो का बाऊण्ड्री कराना सरकार का काम नहीं ।हिन्दु मन्दिरों का धन लेना ।सनातन धर्म के मान्यताओ , परंपराओं मे सुधार या मानवता या समानता की स्थापना की कोशिश न तो सरकार न ही न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का विषय है।सरकार को और सांसदो को धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा समझने चाहिए।यह गुढ तत्व दर्शन पर आधारित चीजे हैं जिसके विषय धर्माचार्यों द्वारा निर्धारित होते हैं ।जो धर्म के पूर्ण जानकार होते हैं ।राजनीतिक व्यक्ति एवं न्यायपालिका को सिर्फ न्याय व्यवस्था के उल्लंघन संबंधित या विवादित मामलो को जो उनके सामने पेश हो धर्माचार्यों की सहमति के आधार पर निर्णय लेने का अधिकार है। राजसत्ता धर्मसत्ता से ऊपर नहीं किन्तु अगर कोई धर्म संविधान के दायरे के बाहर जाकर अधर्म अमानवीयता असहिष्णुता को धर्म आस्था मानकर किसी धर्म पर प्रहार करे किसी की धार्मिक स्वतंत्रता एवं लोकतंत्र के लिए खतरा बने ।कानून को अपने मन मुताबिक हाथ मे लेने की कोशिश करे तो वह अधर्म है और उस अधर्ममय वाद को नष्ट करना धर्म है।समाज , राजसत्ता एवं न्यायपालिका इससे नही निपटाती तो वह अधर्म और अन्याय के राह पर है और नागरिक सुरक्षा को खतरे मे डालना चाहती है। सरकार का परम कर्तव्य है कि वैश्विक स्तर पर व्याप्त ऐसी समस्या का हल ढुंढने के लिए विश्व जनमत को इसके लिए तैयार करे।संयुक्त राष्ट्र संघ एवं अन्तराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एवं संयुक्तराष्ट्र के अन्तराष्ट्रीय अदालत मे अपील दायर करे।विश्व व्यापी बहस छिडवावे।कबीलाई युग का अन्त हो चुका है।विश्व शान्ति सहिष्णुता एवं मानवाधिकारो एवं धार्मिक स्वतंत्रता की यह लडाई लडी जानी चाहिए ।शुद्ध सनातन धर्म संस्कृति की अपनी व्यवस्था है ।इसमे वर्णव्यवस्था समाहित है।जिसमे गुण प्रकृति स्वभाव के अनुरूप अधिकार और कर्तव्य निर्धारित हैं ।आज भी भारत की बडी जनसंख्या इस मत के आधार पर चल रही है।यह व्यवस्था उसे पुस्तैनी रोजगार देकर बेरोजगारी को समाप्त करके ।धर्ममय जीवन जी सकने हेतु रोजगार का भी सृजन करता है।जिसकी अर्थव्यवस्था काफी सुरक्षित है ।वैश्विक अर्थ व्यवस्था की मन्दी और मुद्रास्फीति और अर्थ तंत्र को ध्वस्त होने पर भी भारत को बचा लेगी। सरकार सबको रोजगार यानि नौकरी नही दे सकती।नये व्यवसाय करने पर सीखने एवं अकुशलात पूर्ण प्रबंधन से पूंजी डुबने की संभावना अधिक होती है।बैंको मे एन पी ए का कारण यही है। अतः बेरोजगारी दूर करने हेतु एवं लघु कुटिर उद्योगो को पुन: उसीरूप मे जीवित करने के प्रयास किये जाने चाहिए ।जिसमे सनातन धर्म की सुरक्षा एवं तनाव मुक्त जीवन मिल सके जो भक्ति और मुक्ति के लिए परमावश्यक है।मानव जीवन का परम पुरुषार्थ भक्ति और ज्ञानप्राप्ति ही है।कर्तव्य कर्म ही धर्म है ।कर्म बंधन से मुक्ति एवं कर्तापन के अहंकार से रहित होने एवं साक्षी भाव मे आने के लिए स्वाभावज कर्तव्य कर्म करना ही भक्ति है।मुक्ति का साधन है।जीवन क्षणभंगुर है।यह दृष्य जगत मिथ्या है ।एक भुलभुलैया है।चौरासी लाख योनियो मे से भटकते हुए मानव जीवन के मुक्ति का द्वार मनुष्य जीवन ही है।माया मोह मे फंसे जीव को ईसाईयत के भौतिकवादी चंकाचौध की कामना एवं समृद्धि मे फंसने की जरूरत नहीं लेकिन इसका मतलब यह भी नही की ईमानदारी से धन को बढाने के प्रयास बन्द किये जाने चाहिए ।विद्या ददाति विनयम् ।विनयाद्याति पात्रताम्।पात्रतवाम् धनमाप्नोति।धनात्धर्म: ततःसुखम्।प्रभाकर चौबे चिंतक ब्राह्मण नेता ।

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